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Astrology and You

Astrology is not merely acknowledged as prophecy anymore but an esoteric language of ancient science. Purely mathematical calculations of celestial positions and their influence on our world that can help us to expand our vision and senses to better connect with the supreme cosmic energies that dwell in this vast multi-verse.This profound education has been a part of Indian heritage since forever. It was being utilized in identifying directions in several phases of life great personalities, and is still been nurtured by many aficionados who are pursuing it as a profession and educating others about the same.

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We at Astrolok, pledge to teach diligent aspirers about the depths of studying celestial positions and energies that once was a very popular academic part in many civilizations. Hence, in lead up to this, we stepped in the educational process with our own institute, where we can impart this incredible knowledge of self-discovery with our students who ultimately can help many others in rising above their problems and lead a life of contentment through effective techniques.

Astrolok is been serving as a multi-purpose platform for budding astrologers, wherein its not just the education we impart with them but also provide them with a room for being a part of our expert clan. This will help them to give a kick-start to their career as an astrologer.

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शारदीय नवरात्रि पूजा कब और कैसे करे 10 अक्टूबर से

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इस वर्ष शारदीय नवरात्रि की घटस्थापना प्रतिपदा तिथि, चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में होगी प्रतिपदा तिथि 9 अक्टूबर मंगलवार सुबह 9:16 बजे से प्रारंभ होकर 10 अक्टूबर बुधवार सुबह 7: 25 बजे तक रहेगी। इस वर्ष शारदीय नवरात्रि 10 अक्टूबर से 18 अक्टूबर नवमी तिथि तक चलेगी। घटस्थापना देवी का आव्हान के लिए देवी पुराण व तिथि तत्व में प्रातःकाल प्रतिपदा तिथि एवम् द्विस्वभाव लग्न में घटस्थापना करना श्रेष्ठ बताया गया है। जिससे चित्रा नक्षत्र एवम् वैधृति योग त्याज्य बताया गया है। जिसमे चित्रा नक्षत्र एवम् वैधृति योग का पूर्वार्ध दो चरण त्याग कर घटस्थापना की अनुमति दी है। ये दोनों चरण 9 अक्टूबर की रात्रि को ही समाप्त हो जायेगे। चित्रा नक्षत्र दिन में 11:01 बजे तक रहेगा व वैधृति योग 11:58 बजे तक रहेगा। नवरात्रि प्रथमा तिथि घटस्थापना,चन्द्रदर्शन, शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी पूजा 10 अक्टूबर 2018 बुधवार द्वितीया तिथि द्वितीया तिथि का क्षय तृतीया तिथि सिन्दूर चंद्रघंटा 11 अक्टूबर 2018 वृहस्पतिवार, चतुर्थी तिथि कुष्मांडा 12 अक्टूबर 2018 शुक्रवार पंचमी तिथि स्कंदमाता 13 अक्टूबर 2018 शनिवार पंचमी तिथि सरस्वती आवाहन 14 अक्टूबर 2018 रविवार षष्ठी तिथि कात्यायनी, सरस्वती पूजा 15 अक्टूबर 2018 सोमवार सप्तमी तिथि कालरात्रि 16 अक्टूबर 2018 मंगलवार अष्टमी तिथि महागौरी 17 अक्टूबर 2018 बुधवार नवमी तिथि सिद्धिदात्री 18 अक्टूबर 2018 वृहस्पतिवार दशमी तिथि विजयदशमी 19 अक्टूबर 2018 शुक्रवार नवरात्र में अखंड ज्योत का महत्व: अखंड ज्योत को जलाने से घर में हमेशा मां दुर्गा की कृपा बनी रहती है। नवरात्र में अखंड ज्योत के कुछ नियम होते हैं जिन्हें नवरात्र में पालन करना होता है। परंम्परा है कि जिन घरों में अखंड ज्योत जलाते है उन्हें जमीन पर सोना होता है। नवरात्र में मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजा होती है। जानिए इस वर्ष नवरात्र में मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजन तिथि: शारदीय नवरात्रि दुर्गा पूजा 10 अक्टूबर 2018 बुधवार ,,, कलश स्थापना (घटस्थापना) का शुभ मुहूर्त कलश स्थापना मुहूर्त = 06:22 से 07:25 तक। मुहूर्त की अवधि = 01 घंटा 02 मिनट। कलश स्थापना और पूजन के लिए महत्त्वपूर्ण वस्तुएं मिट्टी का पात्र और जौ के ११ या २१ दाने शुद्ध साफ की हुई मिट्टी जिसमे पत्थर नहीं हो शुद्ध जल से भरा हुआ मिट्टी , सोना, चांदी, तांबा या पीतल का कलश मोली (लाल सूत्र) अशोक या आम के 5 पत्ते कलश को ढकने के लिए मिट्टी का ढक्कन साबुत चावल एक पानी वाला नारियल पूजा में काम आने वाली सुपारी कलश में रखने के लिए सिक्के लाल कपड़ा या चुनरी,,मिठाई,,लाल गुलाब के फूलो की माला नवरात्र कलश स्थापना की विधि महर्षि वेद व्यास से द्वारा भविष्य पुराण में बताया गया है की कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को अच्छे से शुद्ध किया जाना चाहिए। उसके उपरान्त एक लकड़ी का पाटे पर लाल कपडा बिछाकर उसपर थोड़े चावल गणेश भगवान को याद करते हुए रख देने चाहिए | फिर जिस कलश को स्थापित करना है उसमे मिट्टी भर के और पानी डाल कर उसमे जौ बो देना चाहिए | इसी कलश पर रोली से स्वास्तिक और ॐ बनाकर कलश के मुख पर मोली से रक्षा सूत्र बांध दे | कलश में सुपारी, सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रख दे और फिर कलश के मुख को ढक्कन से ढक दे। ढक्कन को चावल से भर दे। पास में ही एक नारियल जिसे लाल मैया की चुनरी से लपेटकर रक्षा सूत्र से बांध देना चाहिए। इस नारियल को कलश के ढक्कन रखे और सभी देवी देवताओं का आवाहन करे । अंत में दीपक जलाकर कलश की पूजा करे । अंत में कलश पर फूल और मिठाइयां चढ़ा दे | अब हर दिन नवरात्रों में इस कलश की पूजा करे | ध्यान देने योग्य बात : जो कलश आप स्थापित कर रहे है वह मिट्टी, तांबा, पीतल , सोना ,या चांदी का होना चाहिए। भूल से भी लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग नहीं करे नव का अर्थ नौ तथा अर्ण का अर्थ अक्षर होता है। अतः नवार्ण नवों अक्षरों वाला वह मंत्र है, नवार्ण मंत्र 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे' है।नौ अक्षरों वाले इस नवार्ण मंत्र के एक-एक अक्षर का संबंध दुर्गा की एक-एक शक्ति से है और उस एक-एक शक्ति का संबंध एक-एक ग्रह से है। नवार्ण मंत्र का जाप 108 दाने की माला पर कम से कम तीन बार अवश्य करना चाहिए। ब्रह्मांड के सारे ग्रह एकत्रित होकर जब सक्रिय हो जाते हैं, तब उसका दुष्प्रभाव प्राणियों पर पड़ता है। ग्रहों के इसी दुष्प्रभाव से बचने के लिए नवरात्रि में दुर्गा की पूजा की जाती है। आइए जानें मां दुर्गा के नवार्ण मंत्र और उनसे संचालित ग्रह 1 नवार्ण मंत्र के नौ अक्षरों में पहला अक्षर ऐं है, जो सूर्य ग्रह को नियंत्रित करता है। ऐं का संबंध दुर्गा की पहली शक्ति शैल पुत्री से है, जिसकी उपासना 'प्रथम नवरात्र' को की जाती है 2 दूसरा अक्षर ह्रीं है, जो चंद्रमा ग्रह को नियंत्रित करता है। इसका संबंध दुर्गा की दूसरी शक्ति ब्रह्मचारिणी से है, जिसकी पूजा दूसरे नवरात्रि को होती है। 3 तीसरा अक्षर क्लीं है, चौथा अक्षर चा, पांचवां अक्षर मुं, छठा अक्षर डा, सातवां अक्षर यै, आठवां अक्षर वि तथा नौवा अक्षर चै है। जो क्रमशः मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु ग्रहों को नियंत्रित करता है। इन अक्षरों से संबंधित दुर्गा की शक्तियां क्रमशः चंद्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री हैं, जिनकी आराधना क्रमश : तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे, सातवें, आठवें तथा नौवें नवरात्रि को की जाती है। इस नवार्ण मंत्र के तीन देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं तथा इसकी तीन देवियां महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती हैं, दुर्गा की यह नवों शक्तियां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की प्राप्ति में भी सहायक होती हैं। नवरात्रि का पर्व नौ शक्ति रुपी देवियों के पूजा के लिए है | यह सभी देवी रूप अपने आप में शक्ति और भक्ति के भंडार है | जगत में अच्छाई के लिए माँ का कल्याणकारी रूप सिद्धिदात्री , महागौरी आदि है, और इसी के साथ जगत में पनप रही बुराई के लिए माँ कालरात्रि , चन्द्रघंटा रूप धारण कर लेती है | अब जाने वे बीज मंत्र जो इन नौ देवियों को प्रसन्न करते है | हर एक देवी का पृथक बीज मंत्र यहाँ दिया गया है | 1. शैलपुत्री : ह्रीं शिवायै नम: 2. ब्रह्मचारिणी : ह्रीं श्री अम्बिकायै नम: 3. चन्द्रघंटा : ऐं श्रीं शक्तयै नम: 4. कूष्मांडा ऐं ह्री देव्यै नम: 5. स्कंदमाता : ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम: 6. कात्यायनी : क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम: 7. कालरात्रि : क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम: 8. महागौरी : श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम: 9. सिद्धिदात्री : ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम: देवी दुर्गा के नौ रूप कौन कौन से है - प्रथम् शैल-पुत्री च, द्वितियं ब्रह्मचारिणि तृतियं चंद्रघंटेति च चतुर्थ कूषमाण्डा पंचम् स्कन्दमातेती, षष्टं कात्यानी च सप्तं कालरात्रेति, अष्टं महागौरी च नवमं सिद्धिदात्ररी शैलपुत्री ( पर्वत की बेटी ) वह पर्वत हिमालय की बेटी है और नौ दुर्गा में पहली रूप है । पिछले जन्म में वह राजा दक्ष की पुत्री थी। इस जन्म में उसका नाम सती-भवानी था और भगवान शिव की पत्नी । एक बार दक्षा ने भगवान शिव को आमंत्रित किए बिना एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया था देवी सती वहा पहुँच गयी और तर्क करने लगी। उनके पिता ने उनके पति (भगवान शिव) का अपमान जारी रखा था ,सती भगवान् का अपमान सहन नहीं कर पाती और अपने आप को यज्ञ की आग में भस्म कर दी | दूसरे जन्म वह हिमालय की बेटी पार्वती- हेमावती के रूप में जन्म लेती है और भगवान शिव से विवाह करती है। भ्रमाचारिणी (माँ दुर्गा का शांति पूर्ण रूप) दूसरी उपस्तिथि नौ दुर्गा में माँ ब्रह्माचारिणी की है। " ब्रह्मा " शब्द उनके लिए लिया जाता है जो कठोर भक्ति करते है और अपने दिमाग और दिल को संतुलन में रख कर भगवान को खुश करते है । यहाँ ब्रह्मा का अर्थ है "तप" । माँ ब्रह्मचारिणी की मूर्ति बहुत ही सुन्दर है। उनके दाहिने हाथ में गुलाब और बाएं हाथ में पवित्र पानी के बर्तन ( कमंडल ) है। वह पूर्ण उत्साह से भरी हुई है । उन्होंने तपस्या क्यों की उसपर एक कहानी है | पार्वती हिमवान की बेटी थी। एक दिन वह अपने दोस्तों के साथ खेल में व्यस्त थी नारद मुनि उनके पास आये और भविष्यवाणी की "तुम्हरी शादी एक नग्न भयानक भोलेनाथ से होगी और उन्होंने उसे सती की कहानी भी सुनाई। नारद मुनि ने उनसे यह भी कहा उन्हें भोलेनाथ के लिए कठोर तपस्या भी करनी पढ़ेगी। इसीलिए माँ पार्वती ने अपनी माँ मेनका से कहा की वह शम्भू (भोलेनाथ ) से ही शादी करेगी नहीं तोह वह अविवाहित रहेगी। यह बोलकर वह जंगल में तपस्या निरीक्षण करने के लिए चली गयी। इसीलिए उन्हें तपचारिणी ब्रह्मचारिणी कहा जाता है। चंद्रघंटा ( माँ का गुस्से का रूप ) तीसरी शक्ति का नाम है चंद्रघंटा जिनके सर पर आधा चन्द्र (चाँद ) और बजती घंटी है। वह शेर पर बैठी संगर्ष के लिए तैयार रहती है। उनके माथे में एक आधा परिपत्र चाँद ( चंद्र ) है। वह आकर्षक और चमकदार है । वह ३ आँखों और दस हाथों में दस हतियार पकडे रहती है और उनका रंग गोल्डन है। वह हिम्मत की अभूतपूर्व छवि है। उनकी घंटी की भयानक ध्वनि सभी राक्षसों और प्रतिद्वंद्वियों को डरा देती है । कुष्मांडा ( माँ का ख़ुशी भरा रूप ) माँ के चौथे रूप का नाम है कुष्मांडा। " कु" मतलब थोड़ा "शं " मतलब गरम "अंडा " मतलब अंडा। यहाँ अंडा का मतलब है ब्रह्मांडीय अंडा । वह ब्रह्मांड की निर्माता के रूप में जानी जाती है जो उनके प्रकाश के फैलने से निर्माण होता है। वह सूर्य की तरह सभी दस दिशाओं में चमकती रहती है। उनके पास आठ हाथ है ,साथ प्रकार के हतियार उनके हाथ में चमकते रहते है। उनके दाहिने हाथ में माला होती है और वह शेर की सवारी करती है। स्कंदमाता ( माँ के आशीर्वाद का रूप ) देवी दुर्गा का पांचवा रूप है " स्कंद माता ", हिमालय की पुत्री , उन्होंने भगवान शिव के साथ शादी कर ली थी । उनका एक बेटा था जिसका नाम "स्कन्दा " था स्कन्दा देवताओं की सेना का प्रमुख था । स्कंदमाता आग की देवी है। स्कन्दा उनकी गोद में बैठा रहता है। उनकी तीन आँख और चार हाथ है। वह सफ़ेद रंग की है। वह कमल पैर बैठी रहती है और उनके दोनों हाथों में कमल रहता है। कात्यायनी ( माँ दुर्गा की बेटी जैसी ) माँ दुर्गा का छठा रूप है कात्यायनी। एक बार एक महान संत जिनका नाम कता था , जो अपने समय में बहुत प्रसिद्ध थे ,उन्होंने देवी माँ की कृपा प्राप्त करने के लिए लंबे समय तक तपस्या करनी पढ़ी ,उन्होंने एक देवी के रूप में एक बेटी की आशा व्यक्त की थी। उनकी इच्छा के अनुसार माँ ने उनकी इच्छा को पूरा किया और माँ कात्यानी का जन्म कता के पास हुआ माँ दुर्गा के रूप में। कालरात्रि ( माँ का भयंकर रूप ) माँ दुर्गा का सातवाँ रूप है कालरात्रि। वह काली रात की तरह है, उनके बाल बिखरे होते है, वह चमकीले भूषण पहनती है। उनकी तीन उज्जवल ऑंखें है ,हजारो आग की लपटे निकलती है जब वह सांस लेती है। वह शावा (मृत शरीर ) पे सावरी करती है,उनके दाहिने हाथ में उस्तरा तेज तलवार है। उनका निचला हाथ आशीर्वाद के लिए है। । जलती हुई मशाल ( मशाल ) उसके बाएं हाथ में है और उनके निचले बाएं हाथ में वह उनके भक्तों को निडर बनाती है। उन्हें "शुभकुमारी" भी कहा जाता है जिसका मतलब है जो हमेश अच्छा करती है। महागौरी ( माँ पार्वती का रूप और पवित्रता का स्वरुप ) आठवीं दुर्गा " महा गौरी है।" वह एक शंख , चंद्रमा और जैस्मीन के रूप सी सफेद है, वह आठ साल की है,उनके गहने और वस्त्र सफ़ेद और साफ़ होते है। उनकी तीन आँखें है ,उनकी सवारी बैल है ,उनके चार हाथ है। उनके निचले बाय हाथ की मुद्रा निडर है ,ऊपर के बाएं हाथ में " त्रिशूल " है ,ऊपर के दाहिने हाथ डफ है और निचला दाहिना हाथ आशीर्वाद शैली में है।वह शांत और शांतिपूर्ण है और शांतिपूर्ण शैली में मौजूद है. यह कहा जाता है जब माँ गौरी का शरीर गन्दा हो गया था धुल के वजह से और पृत्वी भी गन्दी हो गयी थी जब भगवान शिव ने गंगा के जल से उसे साफ़ किया था। तब उनका शरीर बिजली की तरह उज्ज्वल बन गया.इसीलिए उन्हें महागौरी कहा जाता है । यह भी कहा जाता है जो भी महा गौरी की पूजा करता है उसके वर्तमान ,अतीत और भविष्य के पाप धुल जाते है। सिद्धिदात्री (माँ का ज्ञानी रूप ) माँ का नौवा रूप है " सिद्धिदात्री " ,आठ सिद्धिः है ,जो है अनिमा ,महिमा ,गरिमा ,लघिमा ,प्राप्ति ,प्राकाम्य ,लिषित्वा और वशित्व। माँ शक्ति यह सभी सिद्धिः देती है। उनके पास कई अदबुध शक्तिया है ,यह कहा जाता है "देवीपुराण" में भगवान शिव को यह सब सिद्धिः मिली है महाशक्ति की पूजा करने से। उनकी कृतज्ञता के साथ शिव का आधा शरीर देवी का बन गया था और वह " अर्धनारीश्वर " के नाम से प्रसिद्ध हो गए। माँ सिद्धिदात्री की सवारी शेर है ,उनके चार हाथ है और वह प्रसन्न लगती है। दुर्गा का यह रूप सबसे अच्छा धार्मिक संपत्ति प्राप्त करने के लिए सभी देवताओं , ऋषियों मुनीस , सिद्ध , योगियों , संतों और श्रद्धालुओं के द्वारा पूजा जाता है। दुर्गा सप्तशती के चमत्कारी मंत्र - 1 आपत्त्ति से निकलने के लिए शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे ।सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमो स्तु ते ॥ 2 भय का नाश करने के लिए सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्वशक्तिमन्विते ।भये भ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमो स्तु ते ॥ 3 जीवन के पापो को नाश करने के लिये । हिनस्ति दैत्येजंसि स्वनेनापूर्य या जगत् ।सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव ॥ 4 बीमारी महामारी से बचाव के लिए रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभिष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्माश्रयतां प्रयान्ति ॥ 5 पुत्र रत्न प्राप्त करने के लिए देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते । देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ 6 इच्छित फल प्राप्ति एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः 7 महामारी के नाश के लिए जयन्ती मड्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा स्वधा नमो स्तु ते ॥ 8 शक्ति और बल प्राप्ति के लिये सृष्टि स्तिथि विनाशानां शक्तिभूते सनातनि । गुणाश्रेय गुणमये नारायणि नमो स्तु ते ॥ 9 इच्छित पति प्राप्ति के लिये ॐ कात्यायनि महामाये महायेगिन्यधीश्वरि । नन्दगोपसुते देवि पतिं मे कुरु ते नमः v॥ 10 इच्छित पत्नी प्राप्ति के लिये पत्नीं मनोरामां देहि मनोववृत्तानुसारिणीम् । तारिणीं दुर्गसंसार-सागरस्य कुलोभ्दवाम् ॥॥!! ज्योतिषाचार्य सुनील चोपड़ा Astrolok is one of the 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जानिये कब बनेगा " स्वयं के घर का योग "

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" स्वयं के घर का योग " जैसा की हर व्यक्ति की इच्छा होती हैं की उसका स्वयं का घर हो लेकिन कई प्रयास के बाद भी उसको किराये के मकान या पुश्तैनी मकान में रहना पड़ता हैं इस प्रश्न का उत्तर वैदिक पद्धति द्वारा ज्योतिषीय दृष्टिकोण से ही मिल सकता हैं. यहाँ हमें वर्तमान समय में ग्रहो की महादशा व अन्तर्दशा का अध्ययन करना पड़ेगा साथ साथ हमें गोचर में गुरु व शनि का भी अध्ययन करना पड़ेगा. १) यदि महादशानाथ या अन्तर्दशानाथ का सम्बन्ध चतुर्थ भाव/ चतुर्थेश से हो तो मकान का योग बनता हैं. २) यदि महादशानाथ या अन्तर्दशानाथ के स्वामी का सम्बन्ध एकादश भाव/ एकादशेश से हो  तो भी मकान का योग बनता हैं  क्यूंकि इच्छापूर्ति  होती हैं जब मकान बनंता हैं. ३) यदि महादशानाथ या अन्तर्दशानाथ के स्वामी का सम्बन्ध तृतीय भाव/तृतियेश से हो तो पुराना मकान बिकने के बाद नया मकान बनता हैं. ४) यदि महादशानाथ या अन्तर्दशानाथ के स्वामी का सम्बन्ध छटे भाव या छटे भाव के स्वामी से हो  और उसका सम्बन्ध चौथे भाव के स्वामी या चौथे भाव से होता हैं तो मकान कर्जा लेकर बनाना पड़ता हैं. ५) यदि महादशानाथ या अन्तर्दशानाथ के स्वामी का सम्बन्ध बारवे भाव/बारवे भाव के स्वामी से हो तो मकान इन्वेस्टमेंट के हिसाब से बनता हैं. महत्वपूर्ण नोट:- स्वयं का मकान बनाने के लिए हनुमान जी व शनि महाराज की उपासना करना चाहिए क्यूंकि जमीन के कारक मंगल ग्रह हैं व कंस्ट्रक्शन के कारक शनि ग्रह हैं इसलिए दोनों की सेवा करने से मकान जल्दी व शांतिपूर्ण तरीके से बन जाता हैं. Guruwani (Astrologer & Consultant) 98267-36794 Astrolok is one of the best astrology institute where you can learn vedic astrology, marriage astrology, nadi astrology, horoscope matching through live vedic astrology classes. It is a free platform to write astrology articles. Become a part of it by registering at https://astrolok.in/my-profile/register/
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जानिए क्या हैं राहु??राहु की विशेषता , राहु का असर/प्रभाव और उपाय आदि

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ज्योतिष शास्त्र का एक ऐसा ग्रह जिसके नाम से लोगों को सर्वाधिक डर लगता है। जो इतना शक्तिशाली है की सूर्य और चन्द्र जैसे ग्रहों को भी ग्रहण लगा देता है।
नीलाम्बरो नीलवपु: किरीटी करालवक्त्र: करवालशूली। चतुर्भुजश्चक्रधरश्च राहु: सिंहाधिरूढो वरदोऽस्तु मह्यम॥
 
नवग्रहों में यह अकेला ही ऐसा ग्रह है जो सबसे कम समय में किसी व्यक्ति को करोड़पति, अरबपति या फिर कंगाल भी बना सकता है तथा इसी लिए इस ग्रह को मायावी ग्रह के नाम से जाना जाता है।
"अर्धकायं महावीर्य चन्द्रादित्यविमर्दनम्।
सिंहिकागर्भ सम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ||"
राहु को जानिये - 1 (Rahu - Part 1)
    • खगोल विज्ञान के अनुसार राहु केतु का सौरमंडल में अपना कोई आस्तित्व नहीं है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथों के आपस में काटने के दो बिन्दुओं (Node) के द्योतक हैं। इसको पातबिंदु भी कहते हैं।
    • क्रांतिवृत्त / रविपथ / सूर्य पथ (वह आकाशीय रेखा है जिस पर हमे सूर्य भ्रमण करता हुआ प्रतीत होता है वास्तविक रूप में यह पृथ्वी का भ्रमण पथ है) और चन्द्र-पथ (जिस रास्ते से चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है) एक-दूसरे के समानांतर नहीं हैं और ये दोनों पथ एक-दूसरे को काटते हैं. जब चन्द्र पृथ्वी के चारो ओर चक्कर लगाते समय क्रांतिवृत्त को काटते हुए नीचे से ऊपर की ओर जाता है तो कटान बिंदु को राहू का नाम दिया गया है और इसको 'आरोही-पात' (Ascending Node)  भी कहते हैं.
    • प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और गणितज्ञ आर्यभट्ट ने कहा कि पृथ्वी व चंद्र की छाया के कारण ग्रहण होता है। अर्थात्‌ पृथ्वी की बड़ी छाया जब चन्द्रमा पर पड़ती है तो चन्द्र ग्रहण होता है। इसी प्रकार चन्द्र जब पृथ्वी और सूर्य के बीच आता है तो सूर्यग्रहण होता है। ज्योतिषशास्त्र इसी छाया को राहु-केतु मानता है इसी कारण राहु को छाया ग्रह कहा गया है।
    • छाया का हमारे जीवन में बहुत असर होता है। कहते हैं कि रोज पीपल की छाया में सोने वाले को किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता लेकिन यदि बबूल की छाया में सोते रहें तो दमा या चर्म रोग हो सकता है। इसी तरह ग्रहों की छाया का हमारे जीवन में असर होता है
यह हैं राहु की कथा --
जब समुद्रमंथन के बाद जिस समय भगवान विष्णु मोहिनी रूप में देवताओं को अमृत पिला रहे थे, उसी समय राहु देवताओं का वेष बनाकर उनके बीच में आ बैठा और देवताओं के साथ उसने भी अमृत पी लिया। परंतु तत्क्षण चंद्रमा और सूर्य ने उसकी असलियत बता दी।
अमृत पिलाते-पिलाते ही भगवान ने अपने तीक्ष्ण धारवाले सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट डाला। भगवान विष्णु के चक्र से कटने पर सिर राहु कहलाया और धड़ केतु के नाम से प्रसिद्ध हुआ। परंतु अमृत का संसर्ग होने से वह अमर हो गया फलस्वरूप ब्रह्माजी ने उसे ग्रह बना दिया। तभी से अन्य ग्रहों के साथ राहु भी ब्रह्मा की सभा में बैठता है।
ऐसा हैं राहु का स्वरुप --
  1. राहु की माता का नाम सिंहिका है, जो विप्रचित्ति की पत्नी तथा हिरण्यकशिपु की पुत्री थी। माता के नाम से राहु को सैंहिकेय भी कहा जाता है।
  2. पौराणिक कथाओं के अनुसार राहु का मुख भयंकर है। राहु को सांप का मुख कहा गया है। ये सिर पर मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर काले रंग का वस्त्र धारण करते हैं। इनके हाथों में तलवार, ढाल, त्रिशूल और वरमुद्रा है। राहु सिंह के आसन पर विराजमान हैं। मत्स्यपुराण के अनुसार राहु का रथ अंधकार रूप है। इसे कवच आदि से सजाए हुए काले रंग के आठ घोड़े खींचते हैं।
जानिए राहु की विशेषता--
ईष्ट देवी : सरस्वती
रंग : नीला , काला
नक्षत्र : आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा
गुण : सोचने की ताकत, डर, शत्रुता
शक्ति : कल्पना शक्ति का स्वामी, पूर्वाभास तथा अदृश्य को देखने की शक्ति।
शरीर का भाग : ठोड़ी, सिर, कान, जिह्वा
पशु : काँटेदार जंगली चूहा, हाथी, बिल्ली व सर्प
वृक्ष : नारियल का पेड़, कुत्ता घास
वस्तु : नीलम, सिक्का, गोमेद, कोयला
फूल : नीले
दिशा : नैऋत्य कोण दिशा : नैऋत्य कोण
  1. बुध ग्रह हमारी बुद्धि का कारण है, लेकिन जो ज्ञान हमारी बुद्धि के बावजूद पैदा होता है उसका कारण राहु है. जैसे मान लो कि अकस्मात हमारे दिमाग में कोई विचार आया या आइडिया आया तो उसका कारण राहु है। राहु हमारी कल्पना शक्ति है तो बुध उसे साकार करने के लिए बुद्धि कौशल पैदा करता है।
  2. यह ग्रह वायु तत्व म्लेच्छ प्रकृति तथा नीले रंग पर अपना विशेष अधिकार रखता है।
  3. ध्वनि तरंगों पर राहु का विशेष अधिकार है।
  4. राहु-केतु का स्वतंत्र प्रभाव नहीं होता है। वे जिस राशि में या जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उसके अनुसार प्रभाव दिखाते हैं।
  5. जातक पारिजात के अनुसार जो ग्रह राहु के साथ बैठा हो वह शुभ फल नहीं देता। राहु जिस राशि में बैठा हो तो उसका स्वामी अच्छा फल नहीं देता है। राहु राशिपति के गृह में जो ग्रह बैठा है वह अच्छा फल नहीं देता ।
  6. मीन राशि में गया राहु हमेशा कष्टकारी होता है.

राहु के कारक -

दादा, वाणी की कठोरता, खोजी, प्रवृत्ति, विदेश प्रवास भ्रमण, अभाव, चमड़ी पर धब्बा, त्वचा रोग, सांप के काटने, जहर, महामारी, पर स्त्री से संबंध, नाना-नानी, निरर्थक तर्क-वितर्क, कपट, धोखे, वैधव्य, दर्द और सूजन, ऊंची आवाज से कमजोरों को दबाने, और दिल को ठेस पहुंचाने की प्रवृत्ति, अंधेरे, चुगलखोरी, पाखंड, बुरी आदतों, भूख व डर से दिल बैठने की अवस्था, अंग-भंग, कुष्ठ रोग, ताकत, खर्चे, मान-मर्यादा, शत्रु, देश से निस्कासन, तस्करी, जासूसी, आत्महत्या, शिकार, गुलामी, पत्थर .

राहु शिव के अनन्य भक्त हैं। एक श्लोक में इन्हें भगवान नीलकण्ठ के ह्वदय में वास करने वाला कहा गया है-
कालदृष्टि कालरूपा: श्रीकण्ठ: ह्वदयाश्रय:। विद्युन्तदाह: सैहिंकयो घोररूपा महाबला: || 
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जानिये क्या हैं श्राद्ध कर्म में निषिद्ध कर्म ???

vastu
श्राद्ध कर्म और पिंडदान आदि का कार्य वैदिक पूजा पद्धति पर आधारित है। पित्तरों को भी हमारे ऋषि-मुनियों ने देव तुल्य ही माना है। अतः जिस दिन पितृ पूजा का कार्य किया जाए, उस दिन कई कार्य करने निषिद्ध माने गये है, जबकि कुछ कार्य करने अनिवार्य बताये गये है। अतः श्राद्ध और पिंडदान आदि करते समय इस बात का विषेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। जिस दिन श्राद्ध और पिंडदान का कार्य संपादित किया जाए, उस दिन कई तरह के कर्म करने निषिद्ध माने गये है। ऐसे कुछ कर्म निम्न प्रकार हैः- ऽ श्राद्ध वाले दिन प्रातः काल स्नानादि तो अवष्य करने चाहिए और षरीर पर भी ष्वते रंग के स्वच्छ वस्त्र ही धारण करने चाहिए, लेकिन उस दिन स्नान से पूर्व दातुन आदि नहीं करनी चाहिए। श्राद्ध के दिन अन्य षुद्धि कर्म तो किए जा सकते है, लेकिन उस दिन दातुन आदि करना निषिद्ध माना गया है। ऽ इसी तरह श्राद्ध के दिन स्नानादि के पष्चात् अपने बालों में तेल भी नहीं लगाना चाहिए और न ही उस दिन अपने षरीर पर तेल मर्दन ही करना चाहिए। ऽ श्राद्ध वाले दिन वस्त्रादि भी साफ नही करने चाहिए। इस दिन नये वस्त्र पहनने भी निषेध माने गये है। ऽ श्राद्ध के दिन श्राद्धकर्ता को दाढी आदि के बाल भी नहीं कटवाने चाहिए। यद्यपि श्राद्ध के अतिरिक्त पितृ पूजन के अन्य अवसरों यथा पिंडदान, पितृ तर्पण आदि के समय और अन्त्येष्टि कर्म के दौरान बालादि कटवाकर मुंडन कराना एक अनिवार्य कृत्य माना गया है, किन्तु श्राद्ध वाले दिन या श्राद्ध कर्म के समय दाढी, मूंछ या सिर के बाल कटवाने निषेध माने गये है। अतः श्राद्ध कर्म के दिन इस बात का विषेष ख्याल रखना चाहिए। ऽ पित्तरों के निमित्त पिंडदान या उनकी आत्मिक संतुष्टि के लिए जो नारायण बलि या नाग बलि जैसे पितृ श्राद्ध कर्म सम्पन्न किए जाते है या पितृदोष की निवृत्त के लिए जो भी पूजन, तपर्ण, पिंडदान आदि कर्म सम्पन्न किए जाएं, उन सब में सर्वप्रथम श्राद्धकर्ता को अपने सिर के बाल कटवाकर मुंडन कराना पडता है। इसके अतिरिक्त ऐसे समस्त क्रियाकर्म के दौरान उसे अपने षरीर पर बिना सिले व धुले हुए ष्वेत रंग के नये वस्त्र ही धारण करने वाहिए, लेकिन श्राद्ध वाले दिन षरीर के बाल कटवाने, षरीर पर नये वस्त्र धारण करने तथा गंधादि का लेपन करने जैसे सभी कर्म निषेद्ध माने गए है। श्राद्ध के दिन श्राद्धकर्ता या परिवार के अन्य लोगों को अपने नाखुन आदि भी नहीं काटने चाहिए। ऽ श्राद्धकर्ता को श्राद्ध वाले दिन पान-तम्बाकू या गुटकादि के सेवन से भी परहेज करना चाहिए। श्राद्ध के दिन पित्तरों के निमित्त श्राद्ध में आमन्त्रित ब्राह्यण को पान-सुपारी देना तो ठीक है, लेकिन उस दिन स्वंय पानादि का सेवन करना बिलकुल भी मान्य नहीं है। ऽ श्राद्ध वाले दिन श्राद्धकर्ता के लिए अपने षरीर पर कोई सुवाषित करने वाला द्रव लेपन करना अर्थात् तीव्र गंध, इत्र, सुगंध आदि का प्रयोग करना भी निषिद्ध माना गया है। यद्यपि उस दिन देव, अतिथि, ब्राह्यण आदि के स्वागत निमित्त चंदन, खस, कर्पूर आदि गंधयुक्त इत्र, धूप, दीप, अगरबत्ती आदि का प्रयोग किया जा सकता है। ऽ इस बात का सदैव स्मरण रखना चाहिए कि तीव्र गंधें पित्तरों के साथ-साथ अन्य सूक्ष्म षरीरी प्रेतात्माओं को भी अपनी ओर आकर्षित करती है। इसीलिए अनेक बार इस प्रकार की तीव्र गंधों के प्रयोग से पित्तरजनों साथ सूक्ष्म लोक में विचरण करने वाली अन्य अतृप्त प्रेतात्माएं भी श्राद्धकर्ता या उसके पारिवारिक सदस्यों की ओर आकर्षित होकर चली आती है और उन्हें अपने आवेष में लेने का प्रयास करती है। इसलिए श्राद्ध आदि कर्मों को सम्पन्न करते समय श्राद्धकर्ता के लिए कस्तूरी, रक्त चंदन, ष्वेत चंदन, गोरोचन, सल्लक तथा पूतिक जैसे तीव्र ग्रंध युक्त पदार्थों का प्रयोग करना निषद्ध माना गया है। ऽ तीव्र गंधों की तरह ही कदम्ब, केवडा, मौलश्री, बेल पत्र, करवीर, लाल गुडहल के पुष्प या गंध रहित तीक्ष्ण रंग वाले पुष्प भी श्राद्धकर्म में निषद्ध माने गये है। इसी तरह गुग्गुल का प्रयोग भी श्राद्धकर्म के दौरान वर्जित माना गया है। ऽ श्राद्ध कर्म के समय अग्नि में अकेले ‘घी’ की आहुतियां डालकर हवन करना भी वर्जित है, अर्थात् अकेले घी की आहुति प्रदान करना भी निषिद्ध माना गया है। ऽ श्राद्ध कर्म के समय श्राद्धकर्ता को स्वंय के बैठने के लिए नया आसन ही प्रयुक्त करना चाहिए। श्राद्धकर्म के समय चिता पर बिछाया, मार्ग में प्राप्त हुआ, यज्ञादि मांगलिक कार्यों में प्रयुक्त किए गए या अन्य कर्मों में प्रयुक्त हुए आसनादि के साथ-साथ षरीर पर धारण किए गए वस्त्रों का प्रयोग भी नहीं करना चाहिए। ऽ श्राद्ध कर्म को सम्पन्न करने के लिए ‘कुषा’ आसन का प्रयोग करना उत्तम माना गया है, लेकिन श्राद्ध कर्म के समय पुराना, जीर्ण-षीर्ण कुषा का आसन या मृतक की अन्त्येष्टि के समय, पिंडदान कर्म करते समय उनके नीचे रखा गया अथवा अन्य पिंड कर्मो में प्रयुक्त किया गया ‘‘कुषासन’’ भी प्रयुक्त नहीं करना चाहिए। ऽ श्राद्ध कर्म के समय पुरानी दीपक लगी लकडी का प्रयोग करना भी निषिद्ध माना गया है। ऽ श्राद्ध वाले दिन श्राद्धकर्ता को स्त्री सहचर्य से भी परहेज करना चाहिए। उस दिन तन और मन, दोनों से ही ब्रह्यचर्य धारण करके रखना चाहिए। ऽ संभव हो पाए तो श्राद्धकर्ता को श्राद्ध वाले दिन उपवास रखना चाहिए या फिर जब तक पितृ श्राद्ध का कार्यक्रम सम्पूर्ण न हो जाए और ब्रह्यदेव भोजन करके घर से विदा न ले जाएं, तब तक तो श्राद्धकर्ता को अवष्य ही निराहार रहना चाहिए। यदि उस दिन श्राद्धकर्ता पूरे दिन उपवास न रख सके, तब भी उसे ब्राह्यण भोजन और ब्राह्मण की विदाई के समय तक तो अवष्य ही निराहार रहना चाहिए। ब्राह्यण की विदाई के पष्चात् ही श्राद्धकर्ता को अपने कुल-परिवार के सदस्यों एंव बडे-बुजर्गो, बच्चों आदि को भोजन कराने के बाद पितृ प्रसाद के रूप में स्वंय भोजन ग्रहण करना चाहिए। यदि संभव हो पाए तो उस दिन श्राद्धकर्ता को पुनः भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। यद्यपि सांयकाल के समय वह चॉय, कॉफी, दूध, फल आदि अवष्य अपनी जरूरत अनुसार ले सकता है। ऽ श्राद्ध कर्म के समय एक बात का और भी ध्यान रखना चाहिए कि श्राद्ध के भोजन आदि के निमित्त लौह पात्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए। लौह पात्र का उपयोग न तो स्वंय के भोजन करने के लिए ही करना चाहिए और न ही ब्रह्यदेव को ही लौह पात्र में भोजन कराना चाहिए। ऐसा षास्त्रमत् है कि लौह पात्र के दर्षन मात्र से ही पित्तर रूष्ठ होकर वापिस अपने लोक को चले जाते है और श्राद्धकर्ता को उसके कर्म का कोई फल प्राप्त नहीं होता। यद्यपि लौह निर्मित चाकू आदि का उपयोग पाकषाला में फल, सब्जियां आदि काटने के लिए किया जा सकता है। Astrolok is one of the best astrology institute where you can learn vedic astrology, marriage astrology, nadi astrology, horoscope matching through live vedic astrology classes. 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महालय/श्राध्द पक्ष 2018

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श्राद्ध पक्ष में पितर, ब्राह्मण और परिजनों के अलावा पितरों के निमित्त गाय, श्वान और कौए के लिए ग्रास निकालने की परंपरा है। पितृपक्ष पूर्णिमा से अमावस्या तक 16 दिन का होता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार हमारी मान्यता है कि प्रत्येक की मृत्यु इन 16 तिथियों को छोड़कर अन्य किसी दिन नहीं होती है। इसीलिए इस पक्ष में 16 दिन होते हैं।&nbsp; एक मनौवै‍ज्ञानिक पहलू यह है कि इस अवधि में हम अपने पितरों तक अपने भाव पहुंचाते हैं। चूंकि यह पक्ष वर्षाकाल के बाद आता है अत: ऐसा माना जाता है कि आकाश पूरी तरह से साफ हो गया है और हमारी संवेदनाओं और प्रार्थनाओं के आवागमन के लिए मार्ग सुलभ है।<br>आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या पंद्रह दिन पितृपक्ष (पितृ = पिता) के नाम से विख्यात है। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों (पूर्वजों) को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं। पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात्‌ उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं।&nbsp; ज्योतिष और धर्मशास्त्र कहते हैं कि पितरों के निमित्त यह काल इसलिए भी श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इसमें सूर्य कन्या राशि में रहता है और यह ज्योतिष गणना पितरों के अनुकूल होती है।<br>श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌ (जो श्र्द्धा से किया जाय, वह श्राद्ध है।) भावार्थ है प्रेत और पित्त्तर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाए वह श्राद्ध है।<br>पितृपक्ष में हिन्दू लोग मन कर्म एवं वाणी से संयम का जीवन जीते हैं; पितरों को स्मरण करके जल चढाते हैं; निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते हैं। पितृपक्ष में प्रत्येक परिवार में मृत माता-पिता का श्राद्ध किया जाता है, परंतु गया श्राद्ध का विशेष महत्व है। वैसे तो इसका भी शास्त्रीय समय निश्चित है, परंतु ‘गया सर्वकालेषु पिण्डं दधाद्विपक्षणं’ कहकर सदैव पिंडदान करने की अनुमति दे दी गई है। हमारे हिंदू धर्म-दर्शन के अनुसार जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है; उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म भी निश्चित है। ऐसे कुछ विरले ही होते हैं जिन्हें मोक्ष प्राप्ति हो जाती है। पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात् ही स्व-पितृ तर्पण किया जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं। जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उसी तिथी को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है। पितृ दोष के अनेक कारण होते हैं। परिवार में किसी की अकाल मृत्यु होने से, अपने माता-पिता आदि सम्मानीय जनों का अपमान करने से, मरने के बाद माता-पिता का उचित ढंग से क्रियाकर्म और श्राद्ध नहीं करने से, उनके निमित्त वार्षिक श्राद्ध आदि न करने से पितरों को दोष लगता है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति, वंश-वृद्धि में रूकावट, आकस्मिक बीमारी, संकट, धन में बरकत न होना, सारी सुख सुविधाएँ होते भी मन असन्तुष्ट रहना आदि पितृ दोष हो सकते हैं। यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो तो पितृ दोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्म शांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करवाएँ<br>पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं।<br>उज्जैन के ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि&nbsp; जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं जिसमे हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं। श्राद्घ पक्ष में गाय को गुड़ के साथ रोटी खिलाएं और कुत्ते, बिल्ली और कौओं को भी आहार दें।<br>आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तथा उस उर्जा के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। धार्मिक ग्रंथों में मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति का बड़ा सुन्दर और वैज्ञानिक विवेचन भी मिलता है। मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। पुराणों के अनुसार वह सूक्ष्म शरीर जो आत्मा भौतिक शरीर छोड़ने पर धारण करती है प्रेत होती है। प्रिय के अतिरेक की अवस्था “प्रेत” है क्यों की आत्मा जो सूक्ष्म शरीर धारण करती है तब भी उसके अन्दर मोह, माया भूख और प्यास का अतिरेक होता है। सपिण्डन के बाद वह प्रेत, पित्तरों में सम्मिलित हो जाता है।<br>पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से अंश लेकर वह अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र उर्ध्वमुख होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पितर उसी ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ वापस चले जाते हैं। इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है।<br>तर्पण और पिंड दान करने के बाद पुरोहित या ब्राह्मण को भोजन कराएं और दक्षिणा दें।<br>&nbsp;ब्राह्मण को सीधा या सीदा भी दिया जाता है. सीधा में चावल, दाल, चीनी, नमक, मसाले, कच्‍ची सब्जियां, तेल और मौसमी फल शामिल हैं.&nbsp; ब्राह्मण भोज के बाद पितरों को धन्‍यवाद दें और जाने-अनजाने हुई भूल के लिए माफी मांगे।<br>पुराणों में कई कथाएँ इस उपलक्ष्य को लेकर हैं जिसमें कर्ण के पुनर्जन्म की कथा काफी प्रचलित है। एवं हिन्दू धर्म में सर्वमान्य श्री रामचरित में भी श्री राम के द्वारा श्री दशरथ और जटायु को गोदावरी नदी पर जलांजलि देने का उल्लेख है एवं भरत जी के द्वारा दशरथ हेतु दशगात्र विधान का उल्लेख भरत कीन्हि दशगात्र विधाना तुलसी रामायण में हुआ है।<br>पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शास्त्रों का मत है कि श्राद्घ पक्ष में पितर कई बार जीव-जंतु या मनुष्य के रुप में अपने परिजनों के घर पहुंचते हैं। अगर उस समय उन्हें अन्न जल नहीं मिला और वह नाराज होकर चले गए तो समझ लीजिए आपके बुरे दिन आने वाले हैं। आपकी जितनी श्रद्घा और सामर्थ्य हो उस अनुसार आप दान और ब्राह्मण भोजन करवा सकते हैं। इस काम को करने से पितर बहुत प्रसन्न होते हैं। जो ऐसा करता है उस पर पूरे साल पितरों की कृपा बनी रहती है।<br>हमारे भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण प्रमुख माने गए हैं- पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण। इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितृ ऋण में पिता के अतिरिक्त माता तथा वे सब बुजुर्ग भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने हमें अपना जीवन धारण करने तथा उसका विकास करने में सहयोग दिया।<br>पद्म पुराण का एक प्रसंग बहुचर्चित है कि राजा दशरथ के अतिशय पुत्र मोह वृत्ति के कारण मुक्ति नहीं हो पाई थी, तो भगवान राम ने पुष्कर में अपने पिताश्री का श्राद्ध कर्म सम्पन्न कर उनको अर्पण किया था। तभी उनका साँसारिक मोह से पीछा छूटा। आज भी वहाँ का जल कुण्ड जनश्रद्धा का आकर्षण केन्द्र बना हुआ है। लोग मान्यता है कि इस पवित्र कुण्ड में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के साथ मंगल का योग बिठाने की स्नान किया जाए तो विशेष प्रकार की शाँति मिलती और श्रद्धास्पद वातावरण नवनिर्मित होता है। इसी के फलस्वरूप पुष्कर को ब्रह्मा के तीर्थ, तीर्थराज की मान्यता मिली है।<br>पितृ पक्ष की पौराणिक कथा के अनुसार जोगे और भोगे नाम के दो भाई थे. दोनों अलग-अलग रहते थे. जोगे अमीर था और भोगे गरीब. दोनों भाइयों में तो प्रेम था लेकिन जोगे की पत्‍नी को धन का बहुत अभिमान था. वहीं, भोगे की पत्‍नी बड़ी<br>सरल और सहृदय थी. पितृ पक्ष आने पर जोगे की पत्‍नी ने उससे पितरों का श्राद्ध करने के लिए कहा तो जोगे उसे बेकार की बात समझकर टालने की कोशिश करने लगा. पत्‍नी को लगता था कि अगर श्राद्ध नहीं किया गया तो लोग बातें बनाएंगे.<br>उसने सोचा कि अपने मायके के लोगों को दावत पर बुलाने और लोगों को शान दिखाने का यह सही अवसर है. फिर उसने जोगे से कहा, ‘आप ऐसा शायद मेरी परेशानी की वजह से बोल रहे हैं. मुझे कोई परेशानी नहीं होगी. मैं भोगे की पत्‍नी को<br>बुला लूंगी और हम दोनों मिलकर सारा काप निपटा लेंगे.’ इसके बाद उसने जोगे को अपने मायके न्‍यौता देने के लिए भेज दिया.<br>गरुड़ पुराण में बताया गया है कि पितरों को अन्न जल की प्राप्ति उनके परिवार के सदस्यों द्वारा दिए गए अन्न जल से होती है। इसलिए पूरे वर्ष जब आप सूर्य को जल देने के साथ पितरों को याद करते हुए अंगूठे के सहारे पानी धरती पर गिराएं इससे यह जल पितरों को प्राप्त हो जाता है।<br>अगले दिन भोगे की पत्‍नी ने जोगे के घर जाकर सारा काम किया. रसोई तैयार करके कई पकवान बनाए. काम निपटाने के बाद वह अपने घर आ गई. उसे भी पितरों का तर्पण करना था. दोपहर को पितर भूमि पर उतरे. पहले वह जोगे के घर गए.<br>वहां उन्‍होंने देखा कि जोगे के ससुराल वाले भोजन करने में जुटे हुए हैं. बड़े दुखी होकर फिर वो भोगे के घर गए. वहां पितरों के नाम पर ‘अगियारी’ दे दी गई थी. पितरों ने उसकी राख चाटी और भूखे ही नदी के तट पर जा पहुंचे. थोड़ी ही देर में सारे पितर इकट्ठा हो गए और अपने-अपने यहां के श्राद्धों की बढ़ाई करने लगे. जोगे-भोगे के पितरों ने आपबीती सुनाई. फिर वे सोचने लगे कि अगर भोगे सामर्थ्‍यवान होता तो उन्‍हें भूखा न रहना पड़ता. भोगे के घर पर दो जून की रोटी भी नहीं थी. यही सब सोचकर पितरों को उन पर दया आ गई. अचानक वे नाच-नाच कर कहने लगे- ‘भोगे के घर धन हो जाए, भोगे के घर धन हो जाए.’<br>शाम हो गई. भोगे के बच्‍चों को भी खाने के लिए कुछ नहीं मिला था. बच्‍चों ने मां से कहा कि भूख लगी है. मां ने बच्‍चों को टालने के लिए कहा, ‘जाओ! आंगन में आंच पर बर्तन रखा है. उसे खोल लो और जो कुछ मिले बांटकर खा लेना.’ बच्‍चे वहां गए तो देखते हैं कि बर्तन मोहरों से भरा पड़ा है. उन्‍होंने मां के पास जाकर सारी बात बताई. आंगन में आकर जब भोगे की पत्‍नी ने यह सब देखा तो वह हैरान रह गई. इस तरह भोगे अमीर हो गया, लेकिन उसने घमंड नहीं किया. अगले साल फिर पितर पक्ष आया. श्राद्ध के दिन भोगे की पत्‍नी ने छप्‍पन भोग तैयार किया. ब्राहम्णों को बुलाकर श्राद्ध किया, भोजन कराया और दक्षिणा दी. जेठ-जेठानी को सोने के बर्तनों में भोजन कराया. यह सब देख पितर बड़े प्रसन्‍न और तृप्‍त हो गए.<br>पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि धर्मशास्त्रों अनुसार पितरों का निवास चंद्रमा के उर्ध्वभाग में माना गया है। यह आत्माएं मृत्यु के बाद एक वर्ष से लेकर सौ वर्ष तक मृत्यु और पुनर्जन्म की मध्य की स्थिति में रहते हैं। पितृलोक के श्रेष्ठ पितरों को न्यायदात्री समिति का सदस्य माना जाता है। अन्न से शरीर तृप्त होता है। अग्नि को दान किए गए अन्न से सूक्ष्म शरीर और मन तृप्त होता है। इसी अग्निहोत्र से आकाश मंडल के समस्त पक्षी भी तृप्त होते हैं। पक्षियों के लोक को भी पितृलोक कहा जाता है।<br>पितृ पक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता है। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात ही स्वयं पितृ तर्पण किया जाता है।<br>पितर चाहे किसी भी योनि में हों वे अपने पुत्र, पु‍त्रियों एवं पौत्रों के द्वारा किया गया श्राद्ध का अंश स्वीकार करते हैं। इससे पितृगण पुष्ट होते हैं और उन्हें नीच योनियों से मुक्ति भी मिलती है। यह कर्म कुल के लिए कल्याणकारी है। जो लोग श्राद्ध नहीं करते, उनके पितृ उनके दरवाजे से वापस दुखी होकर चले जाते हैं। पूरे वर्ष वे लोग उनके श्राप से दुखी रहते हैं। पितरों को दुखी करके कौन सुखी रह सकता है?<br>Astrolok is one of the best astrology institute where you can learn vedic astrology, marriage astrology, nadi astrology, horoscope matching through live vedic astrology classes. 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यदि कुंडली में पितृ दोष हो तो श्राद्ध पक्ष में पितरो को तर्पण दे व पाए जीवन में "सफलता"

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यदि कुंडली में पितृ दोष हो तो श्राद्ध पक्ष में पितरो को तर्पण दे व पाए जीवन में "सफलता" यदि आपकी कुंडली में पितृ दोष हैं तो आपके हर काम अटकेंगे व सफलता में बाधक बनेगे जैसे की हर काम आखरी वक्त पर छूट जाना या अधूरा रह जाना या हमेशा जो भी काम हाथ में लेंगे वो अधूरा छूट जायेगा व व्यवसाय में निरंतर हानि होना या बनते काम अधूरे रह जाना, नौकरी बार बार छूटना इत्यादि जिससे की मानसिक अशांति होगी व बुरे ख्याल दिमाग में आएंगे और आप जीवन में निराश होंगे व अपने भाग्य को कोसेंगे पितृ दोष की परिभाषा :- यदि कुंडली में पाप ग्रह शनि, राहु, मंगल, केतु, सूर्य की आपस में युति हो या दृष्टि सम्बन्ध हो रहा हैं तो आपकी कुंडली में पितृ दोष हैं. पितृ दोष को दूर करने के उपाय:- 1) पूर्णिमा व अमावस्या को शिव जी को दूध चढ़ाये व ॐ नमः शिवाय की माला जापे. २) अमावस्या व पूर्णिमा को गरीबो या जरूरतमंद लोगो की सेवा करे. ३) अपने घर में पितरो के लिए एक स्थान अवश्य बनाये व नियमित उनको स्मरण करे व भूल चूक के लिए माफ़ी मांगे. ४) कुतो व पक्षियों की सेवा करे. ५) श्राद्धपक्ष के समय ब्राह्मण को बुला कर विधि विधान के साथ तर्पण करे व भूल चूक के लिए माफ़ी मांगे. ६) बुजुर्गो व अंधे व जरुरतमंद इंसान की मदद करे. सबसे महत्वपूर्ण नोट:- वर्तमान समय में माता पिता की सेवा करे व माता पिता तुल्य लोगो का मान सम्मान करे और उनके आशीर्वाद पाए क्यूंकि जीवन में 70  प्रतिशत काम तो आशीर्वाद से ही  पुरे हो जाते हैं सिर्फ 30 प्रतिशत हमारी मेहनत होती हैं. Guruwani(Astrologer & Consultant)  98267-36794 Astrolok is one of the best astrology institute where you can learn vedic astrology, marriage astrology, nadi astrology, horoscope matching through live vedic astrology classes. It is a free platform to write astrology articles. Become a part of it by registering at https://astrolok.in/my-profile/register/  
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