जानिए दाम्पत्य जीवन पर राहु का दुष्प्रभाव !!!

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यदि आपकी कुंडली में राहू अच्छा नहीं है तो किसी से कोई चीज़ मुफ्त में न लें क्योंकि हर मुफ्त की चीज़ पर राहू का अधिकार होता है |

उधार ली गयी सभी वस्तुएं राहू खराब करती हैं !
राहू ग्रह का कुछ पता नहीं कि कब बदल जाए जैसे कि आप कल कुछ काम करने वाले हैं लेकिन समय आने पर आपका मन बदल जाए और आप कुछ और करने लगें तो इस दुविधा में राहू का हाथ होता है |

किसी भी प्रकार की अप्रत्याशित घटना का दावेदार राहू ही होता है | आप खुद नहीं जानते की आप आने वाले कुछ घंटों में क्या करने वाले हैं या कहाँ जाने वाले हैं तो इसमें निस्संदेह राहू का आपसे कुछ नाता है | या तो राहू लग्नेश के साथ है या लग्न में ही राहू है | यदि आप जानते हैं की आप झूठ की राह पर हैं परन्तु आपको लगता है की आप सही कर रहे हैं तो यह धारणा आपको देने वाला राहू ही है !
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खगोलीय विज्ञान में राहु

राहु और केतु आकाशीय पिण्ड नही है,वरन राहु चन्द्रमा और कांतिवृत का उत्तरी कटाव बिन्दु है। उसे नार्थ नोड के नाम से जाना जाता है। वैसे तो प्रत्येक ग्रह का प्रकास को प्राप्त करने वाला हिस्सा राहु का क्षेत्र है,और उस ग्रह पर आते हुये प्रकाश के दूसरी तरफ़ दिखाई देने वाली छाया केतु का क्षेत्र कहलाता है। यथा ब्रहमाण्डे तथा पिण्डे के अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु के साथ राहु केतु आन्तरिक रूप से जुडे हुये है।कारण जो दिखाई देता है,वह राहु है और जो अन्धेरे में है वह केतु है।

जानिए दाम्पत्य जीवन पर राहु का दुप्रभाव — 
राहु की छाया दाम्पत्य जीवन को तीव्रता से प्रभावित करती है। राहु तथा मंगल मिलकर जहां जातक को जिद्दी बनाते हैं वहीं राहु का सप्तम भाव पर प्रभाव विवाह विच्छेद तक करा देता है, कैसे? 
 
आइए जानें…  
 
किसी भी विवाहित दंपत्ति के दाम्पत्य जीवन का आकलन जन्मकुंडलीके सप्तम भाव से किया जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार पुरुष की कुंडली में शुक्र ग्रह पत्नी व विवाह (कलत्र) कारक होता है तथा स्त्री की कुंडली में बृहस्पति पति तथा दाम्पत्य सुख का कारक होता है। ‘‘ज्योतिषनवनीतम्’’ ग्रंथ के अनुसारः–
 
 गुरुणा सहिते दृष्टे दारनाथे बलान्विते। कारके वा तथा पतिव्रतपरायणा।। 
 
अर्थात् जब सप्तमेश व कारक (शुक्र) बलवान होकर गुरु से युक्त अथवा दृष्ट हों तो जीवन साथी निष्ठावान होता है। परंतु सभी जातक ऐसे भाग्यशाली नहीं होते। सप्तम भाव, भावेश व शुक्र पर मंगल और शनि का प्रभाव मुख्य रूप से दाम्पत्य जीवन में विघ्नकारक माना जाता है, परंतु छाया ग्रह (राहु/केतु) भी इस क्षेत्र में कम दुष्प्रभावी नहीं होते। छाया ग्रहों में राहु इहलोक तथा सांसारिक क्षेत्र में, और केतु परलोक तथा धार्मिक क्षेत्र में विशेष प्रभावी होते हैं।। 
राहु का चंद्रमा व शुक्र दोनों पर दुष्प्रभाव होने से जातक अप्राकृतिक यौन भाव से ग्रस्त होता है। मंगल व शुक्र पर राहु का प्रभाव होने से जातक परिवार, जाति व समाज की परवाह न कर यौन संबंध स्थापित करता है। राहु का शनि पर प्रभाव होने से दीर्घकालीन रोग दाम्पत्य जीवन को दुखमय बना देते हैं।

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