जानिये ज्योतिष शास्त्र की उपादेयता !

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वेद के षडांगों में ज्योतिष शास्त्र की नेत्र संज्ञा ही ज्योतिष के महत्व को प्रतिपादित करने के लिए प्रर्याप्त प्रतीत होती है। जिस प्रकार नेत्रवान् व्यक्ति मार्ग के कंटकों और अवरोधों से स्वयं को बचाता है उसी प्रकार जीवन की विषम परिस्थितियों से अवरोधों को दूर करने का कार्य ज्योतिष शास्त्र करता है।
सिद्धांत, फलित और होरा ये तीन अंग ज्योतिष शास्त्र के हमारे ऋषियों ने शोध किए । सिद्धांत से गणितीय गणनाएं,फलित और होरा से मानव जीवन के शुभ या अशुभ प्रभाव का विचार किया जाता है।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतंकर्म शुभाशुभं,
नाभुक्तंक्क्षीयते चैव कोटिजन्म शतैरपि।।
किए हुए शुभ या अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। करोड़ों जन्म के उपरांत भी बिना भोगे कर्म फल नष्ट नहीं होते। अब यदि इस पौराणिक आधार पर तर्क दिया जाए कि जब कर्म फल का भोगना निश्चित है तो ज्योतिष शास्त्र का इसमें क्या योगदान है? यहीं से तो इस शास्त्र की उपादेयता प्रारम्म होती है क्योंकि आगत शुभ या अशुभ की और इंगित करके ज्योतिष शास्त्र पुरुषार्थ की ओर प्रेरित करता है और भाग्यवादी न बनाकर मनुष्य को कर्मपथ पर अग्रसर करता है
पंच महाभूतों से निर्मित यह शरीर ईश्वरीय प्रकृति का ही अंग है। सूर्यादि ग्रह भी उसी प्रकृति के अंग हैं और उन्हीं ग्रहों की रश्मियों के अंश इस मानव शरीर को प्रभावित करते हैं तथा सत,रज,तम इन त्रिगुणों से युक्त यह मानव अज्ञ और तज्ञ होता है इसलिए इस शास्त्र की उपादेयता को निरर्थक सिद्ध करना मूर्खता के अतिरिक्त कुछ और हो ही नहीं सकता।
ज्योतिष शास्त्र अनादि काल से सूर्य चंद्र ग्रहण,मौसम से सम्बन्धित ज्ञान ग्रहों की उदित अस्त मार्गी बक्री आदि अनेक अवस्थाओं व प्रकृति से जुड़ी अनेक घटनाओं को पूर्वानुमान व गणितीय सिद्धांत के आधार पर सत्य सिद्ध करके अपनी वैज्ञानिकता को सिद्ध कर चुका है। हालांकि फलित ज्योतिष में देश-काल और परिस्थितियों के आधार पर कुछ असमानताएं दृष्टिगोचर होती रहती हैं, यह स्वाभाविक भी है क्योंकि अनेक संसाधनों से युक्त मौसम वैज्ञानिकों का भी अनुमान अधिकांशतः गलत हो जाता है।
ज्योतिष शास्त्र पूर्णतः वैज्ञानिक पद्धति है और इसकी वैज्ञानिकता सतत सिद्ध हो रही है।
ज्योतिषाचार्य संजीव कात्यायन
9450253563

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